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बुधवार, मई 10, 2017

ज़िंदगी की कुरूपता में आशा की धूप देखता कविता-संग्रह

कविता-संग्रह – मुट्ठी भर धूप
कवयित्री – अल्पना नागर 
प्रकाशक – हिन्दुस्तानी भाषा अकादमी 
पृष्ठ – 126
कीमत – 200 /- ( सजिल्द )
77 कविताओं और 25 क्षणिकाओं से सज़ा कविता-संग्रह “ मुट्ठी भर धूप ” अल्पना नागर का पहला कविता-संग्रह है | “ मुट्ठी भर धूप ” किसी कविता का शीर्षक न होकर कवयित्री की उस आशावादी सोच का परिचायक है, जो इन कविताओं में यत्र-तत्र व्याप्त है | 

बुधवार, मई 03, 2017

रूप देवगुण की काव्य साधना को दिखाती पुस्तक

पुस्तक – काव्य का अनवरत यात्री : रूप देवगुण
लेखिका – डॉ. आरती बंसल
प्रकाशक – सुकीर्ति प्रकाशन, कैथल
पृष्ठ – 144
कीमत – 300 /-
कविता की आलोचना के लिए भावुक मन और तार्किक बुद्धि दोनों की आवश्यकता होती है, क्योंकि भावुक मन कविता से तादात्म्य बैठाने में मदद करता है और तार्किक बुद्धि कविता के विभिन्न पहलुओं पर विचार करने में मदद करती है | " काव्य का अनवरत यात्री : रूप देवगुण " नामक पुस्तक पढ़ते हुए यह बात यकीनी रूप से कही जा सकती है कि इस पुस्तक की लेखिका " डॉ. आरती बंसल " में ये दोनों गुण विद्यमान हैं |

बुधवार, मार्च 15, 2017

रूप देवगुण की कहानियों में प्रेम ( अंतिम भाग )

मानवेतर प्राणियों से प्रेम 

प्रेम का संबंध सिर्फ व्यक्तियों से नहीं | मानवेतर प्राणियों से भी प्रेम हो जाता है | मानवेतर प्राणी भी प्रेम को समझते हैं और प्रत्युत्तर में प्रेम करते हैं | सामान्यत: उनकी वफादारी आदमी से भी अधिक होती है | कुत्ता इनमें से सबके आगे है | कुत्तों को अक्सर घरों में पाला जाता है और कुत्ते और उसके मालिक के बीच आदमी-पशु जैसे संबंध न रहकर अपनत्व के संबंध पैदा हो जाते हैं | कुता मालिक और उसके परिवार को अपना मानता है | ‘ समभाव ’ इसी प्रेम को दर्शाती कहानी है |

बुधवार, मार्च 08, 2017

रिश्तों और संबंधों की कहानियाँ

अनाम रिश्ते

रिश्ते सिर्फ खून के ही नहीं होते | कुछ रिश्ते खून से बाहर भी होते हैं | खून से बाहर के रिश्ते अक्सर खून के रिश्तों से ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं, क्योंकि खून के रिश्ते चुनने का अधिकार आपको नहीं होता, लेकिन खून से बाहर के रिश्ते आप खुद चुनते हैं | आमतौर पर हर रिश्ते का नाम होता है, लेकिन कुछ रिश्ते ऐसे भी होते हैं जिनका कोई नाम नहीं होता | ये अनाम रिश्ते अनाम होते हुए भी कुछ ऐसी बात रखते हैं कि इन्हें रिश्ते कहा जाता है | इनमें प्रेम भले ही गुमनाम रूप में बहता है, लेकिन इनमें प्रेम होता अवश्य है, क्योंकि बिना प्रेम के कोई रिश्ता, रिश्ता हो ही नहीं सकता, खासकर ऐसा रिश्ता जिसे चुनने, छोड़ने का अधिकार आपको हर वक्त है | प्रेम के जिस रूप को कोई नाम न दिया जा सके, जिसे किसी परिभाषा में न बांधा जा सके, प्रेम का वो रूप जिन रिश्तों में बहता है, उन्हें अनाम रिश्ते कहा जाता है और ऐसे अनाम रिश्ते बहुधा नाम वाले रिश्तों से कहीं अधिक बेहतर और कहीं अधिक पवित्र होते हैं | ‘ वेदना का चक्रव्यूह ’ ऐसे ही अनाम रिश्ते की कहानी है | यह रिश्ता है यामिनी और प्रकाश के दरम्यान |

बुधवार, मार्च 01, 2017

वासनाजनित आकर्षण को दिखाती कहानियां

आकर्षित होकर लोग प्रेम की ओर ही बढ़ेंगे, यह जरूरी नहीं | कई बार यह आकर्षण वासना को भी जन्म देता है | इस वासना का शिकार कई बार दोनों पक्ष होते हैं तो कभी कोई एक | यह वासनाजनित आकर्षण अक्सर पवित्र दोस्ती को कलुषित कर देता है | दोस्ती को पवित्र रिश्ता माना जाता है या यूँ कहें कि रिश्तों से भी पवित्र होती है दोस्ती, लेकिन दोस्त बनाना जितना आसान है, दोस्ती निभाना उतना ही मुश्किल है | खासकर आधुनिक दौर में जब विपरीत लिंगी दोस्त बन जाते हैं, तब इस रिश्ते की पवित्रता बनाए रखना बड़ी मुश्किल चुनौती होती है | 

बुधवार, फ़रवरी 22, 2017

सहज आकर्षण की कहानियाँ

भाग- 1
भाग - 2 
भाग - 3 
भाग - 4 
भाग - 5 
आकर्षण प्रकृति का शाश्वत नियम है | नैगेटिव और पाजिटिव सदैव एक दूसरे को आकर्षित करते हैं | मानव में भी विपरीत लिंगियों के बीच आकर्षण पाया जाता है | यह स्वाभाविक ही है | यही आकर्षण प्रेम का आधार है | आकर्षण के बिना प्रेम संभव ही नहीं, क्योंकि प्रेम तभी होगा, जब कोई अच्छा लगेगा | अच्छा लगना ही आकर्षण है | प्रेम के लिए आकर्षण आवश्यक तो है, लेकिन आकर्षण ही प्रेम नहीं | यह महज पहला सोपान है | आकर्षण हर बार प्रेम में बदले, यह भी ज़रूरी नहीं | 

मंगलवार, फ़रवरी 14, 2017

अपार आशाएं जगाता लघुकथा-संग्रह

लघुकथा-संग्रह - आशा की किरणें 
लघुकथाकार - सत्यप्रकाश भारद्वाज 
प्रकाशन -  अंशिका पब्लिकेशन 
कीमत - 150 /-
पृष्ठ - 96 ( पेपरबैक )
साहित्य में लघु विधाओं को देखकर इन्हें लिखना जितना आसान लगता हैं, वास्तव में उन्हें लिखना उतना ही कठिन होता है क्योंकि इनमें गागर में सागर भरना होता है, जिसके लिए विशेष महारत की आवश्यकता होती है | आजकल लघुकथाएँ भी काफ़ी मात्रा में लिखी जा रही हैं लेकिन लघुकथाएँ चुटकला बनने से बचें और वे मात्र सपाट बयानी न हों इसके लिए लघुकथाकार का सजग होना बेहद जरूरी है | यूँ तो जीवन का हर विषय लघुकथा में समेटा जा सकता है, लेकिन विषय को लघुकथा का रूप देना ही लघुकथाकार के लिए चुनौती होती है | लघुकथा-संग्रह “ आशा की किरणें ” पढ़ते हुए यह अहसास होता है कि सत्यप्रकाश भारद्वाज जी ने इस चुनौती का सामना सफलतापूर्वक किया है | इस संग्रह में 83 लघुकथाएं है जो जीवन के विभन्न पहलुओं को समेटे हुए हैं |

मंगलवार, फ़रवरी 07, 2017

संस्कार की मार सहता प्रेम

भाग- 1
भाग - 2 
भाग - 3 
भाग - 4 
मन को मारने और मन को जीतने में बड़ा अंतर है, लेकिन दुर्भाग्यवश हमारे समाज में मन को जीतने की बजाए मन को मारना सिखाया जाता है | ऋषि-मुनि भी तो यही करते आए हैं | दुनिया छोड़कर जंगल भाग जाना मन को मारना ही है | ऋषियों की तपस्या को भंग करने के लिए अप्सराओं को भेजा जाता था | अगर ऋषियों ने वासना का दमन करने की बजाए उसे जीता होता तो कोई भी अप्सरा सफल नहीं हो पाती | ऋषियों का बात-बात पर क्रोधित हो उठना भी क्रोध को दबाना है, क्रोध को जीतना नहीं | वासना का दमन, क्रोध का दमन, लालच का दमन कितना भी किया जाए, अवसर पाकर विस्फोट जरूर होता, लेकिन जो इन्हें जीत लेते हैं, वो इनसे पार हो जाते हैं | 

मंगलवार, जनवरी 31, 2017

विशुद्ध प्रेम की कहानी

भाग- 1
भाग - 2 
भाग - 3 
पुस्तक प्राप्ति का स्थान 
प्रेम किया नहीं जाता, बस हो जाता है और प्रेम का हो जाना विशुद्ध प्रेम है और ऐसा प्रेम आमतौर पर विपरीत लिंगियों में ही पाया जाता है | ‘ बस ठीक है ’ कहानी में प्रेम के इस रूप को देखा जा सकता है | प्रेम चाहते सब हैं, लेकिन युवा प्रेम करें, यह भारतीय समाज को कम ही स्वीकार्य है, इसी कारण भारत में प्रचलित अधिकाँश प्रेम कहानियाँ दुखांत हैं | प्रेम के दुखांत होने के अनेक कारण हैं | कभी कोई बेवफा हो जाता है, कभी समाज विरोध करता है, कई बार समाज का डर या संस्कार प्रेम की अभिव्यक्ति में बाधा बन जाते हैं और प्रेम अंदर ही अंदर सुलगता रहता है | हालांकि प्रेमी समाज से टकराने की बातें करते हैं और टकराते भी हैं, लेकिन ‘ बस ठीक है ’ एक ऐसे प्रेमी जोड़े की कहानी है जो दुविधा में ही काफी वक्त व्यतीत कर देता है और समय पर सही फैसला नहीं ले पाता | दुविधा में जीने वाले लोग, समय पर सही फैसला न ले पाने वाले लोग ज़िन्दगी जी नहीं पाते, वे बस वक्त काटते हैं | कहानी का शीर्षक ‘ बस ठीक है ’ भी इसी ओर इंगित करता है |  

मंगलवार, जनवरी 24, 2017

एकनिष्ठ प्रेम और उदात्त प्रेम

प्रेम के अनेक रूप हैं, लेकिन प्रेम शब्द आते ही हमारे ध्यान में प्रेमी-प्रेमिका का चित्र उभरता है | प्रेम के अन्य रूप इस विशुद्ध रूप से उसी प्रकार भिन्न हैं, जैसे भक्ति और वात्सल्य, श्रृंगार रस का अंग होते हुए भी इससे अलग हैं | यह विशुद्ध प्रेम सिर्फ़ अपने प्रियतम को देखता है | दुनिया की उसे कोई परवाह नहीं होती  | ऐसा एकनिष्ठ प्रेम बहुधा समाज को स्वीकार नहीं होता, जिससे ऐसे प्रेम में दुःख मिलते हैं | लेखक इन दुखों को देखकर ऐसे प्रेम के बारे में सोचता है, जिसमें व्यक्तिगत प्रेम की भावना न हो | 

मंगलवार, जनवरी 17, 2017

रूप देवगुण की कहानियों में प्रेम का स्वरूप

रूप देवगुण की कहानियों में प्रेम के ये सब रूप पवित्रता और अपवित्रता के साथ विद्यमान हैं | रूप देवगुण के चार कहानी-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं | पहला कहानी-संग्रह “ मैं+तुम=हम ” 1983 में प्रकाशित हुआ, दूसरा कहानी-संग्रह “ छतें बिन मुंडेर की ” 1985 में, तीसरा कहानी-संग्रह “ कब सोता है यह शहर ” 1992 में और चौथा कहानी-संग्रह “ अनजान हाथों की इबारत ” 2004 में प्रकाशित हुआ | इन चार संग्रहों के अतिरिक्त उनकी चुनिन्दा कहानियों के तीन संकलन भी प्रकाशित हुए, लेकिन उनमें इन्हीं संग्रहों की कहानियाँ हैं | अत: मूल रूप से उनके यही चार कहानी संग्रह हैं और इनमें 45 कहानियाँ संकलित हैं | प्रेम का वर्णन न्यूनाधिक मात्रा में उनके चारों संकलनों की कहानियों में मिलता है |

बुधवार, जनवरी 04, 2017

कहानी और प्रेम

कहानी का इतिहास उतना ही पुराना है, जितना मानवीय जीवन, क्योंकि कहानी मानवीय स्वभाव का हिस्सा है | हर आदमी किसी-न-किसी रूप में कहानी सुनता और सुनाता है | जीवन की हर घटना कहानी का विषय बनती है, ऐसे में प्रेम, जो जीवन का अहम् हिस्सा है, कहानियों से अलग कैसे रह सकता है | प्रेम क्या है ?, इसके बारे में सबका अपना-अपना नज़रिया है | प्रेम के समर्थन में बड़े-बड़े दावे भी किए जाते हैं, और प्रेम को लेकर ही तलवारें भी खिंचती हैं, ऑनर किलिंग होती है | इसके संकुचित और विस्तृत अर्थ समाज में सदा से साथ-साथ व्याप्त रहे हैं | प्रेम को भले किन्हीं भी अर्थों में व्यक्त किया जाए, प्रेम के बारे में यह निश्चित है कि इसके बिना समाज का निर्माण हो ही नहीं सकता; मानव समाज ही नहीं, पशुओं के दल भी इसी भाव पर एकत्र रहते हैं | आखिर ऐसा क्या है प्रेम में ? क्या यह एक-दूसरे की ज़रूरतों की पूर्ति का माध्यम है ? 

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