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बुधवार, मार्च 30, 2016

आरक्षण की बैसाखियाँ आखिर कब तक ?

एक तरफ भारत विकसित देशों की कतार में खड़ा होने को आतुर है, तो दूसरी तरफ भारत के लोग खुद को पिछड़ा साबित करने की होड़ में लगे हुए हैं | राजस्थान के गुर्जरों और गुजरात के पटेलों के बाद अब हरियाणा के जाटों ने इस श्रृंखला में अपना नाम लिखवा दिया है | भारत में किसी भी मांग के लिए जब प्रदर्शन होता है तो सरकारी सम्पत्ति को जलाना, तोड़-फोड़ करना आम बात है, ऐसे में हर प्रदर्शन के दौरान देश को करोड़ों की चपत लग जाती है | इस बार हरियाणा में वहशियत का जो नंगा नाच हुआ, वह तो शर्मनाक है | भीड़ पर किसी का नियन्त्रण नहीं होता, आंदोलनकर्ताओं की मंशा भले ही ऐसी न हो, लेकिन भीड़ में शामिल शरारती तत्व अक्सर मौके का फायदा उठा जाते हैं, लेकिन ऐसा तभी संभव है जब आन्दोलन होता है | सोचने की बात तो यह है कि आजाद देश में आखिर ऐसी नौबत क्यों आती है कि लोगों को सडकों पर उतरना पड़ता है ? यहाँ तक आरक्षण की बात है, यह विचारणीय है कि क्यों लोग खुद को पिछड़ा कहलवाने के लिए हिंसक हो रहे हैं ? आरक्षण की बैसाखियाँ आखिर कब तक जरूरी हैं ?

पिछड़े होने के लाभ 
सबसे पहले तो यह देखा जाना चाहिए कि भारत में पिछड़े होने के क्या लाभ हैं ? भारत में पिछड़ा होना फायदे का सौदा है, क्योंकि पिछड़े लोगों को अनेक लाभ सरकार देती है | एक बार पिछड़े का ठप्पा आप पर लग जाए तो जन्म से लेकर मृत्यु तक आपको सरकार से सहायता मिलेगी | नौकरी के संदर्भ में देखें तो सबसे पहले पढाई के दौरान आपको सहायता मिलेगी, उच्च शिक्षा के दौरान अच्छे संस्थान में दाखिला लेने के लिए कोटा मिलेगा, नौकरी के लिए आरक्षण मिलेगा और फिर जब तक आप राजपत्रित नहीं बनते तब तक हर पदोन्नति में आपका कोटा होगा | जब पूरी उम्र का लाभ हो तो क्यों लोग पिछड़ा बनना न चाहेंगे ?
आरक्षण का दुर्पयोग कैसे हो रहा है 
जब आरक्षण दिया गया, तो क्या कारण थे और इसका लाभ हुआ या नहीं, यह एक विचारणीय प्रश्न है और जब तक इस बात पर चर्चा नहीं होती तब तक आरक्षण का जिन्न बार-बार चिराग से बाहर निकलकर देश की सम्पत्ति को नुक्सान पहुंचाता रहेगा | आजादी के तुरंत बाद भारत में आरक्षण की जरूरत थी, क्योंकि भारत में जाति के आधार पर, आर्थिकता के आधार पर बहुत बड़ी खाई थी और इस खाई को भरने का एक ही तरीका था कि पिछड़े वर्गों को लाभ देकर ऊपर उठाया जाए | जिन परिवारों को आरक्षण मिला उनकी आर्थिक स्थिति आप देख सकते हैं, लेकिन आरक्षण को लागू करते समय जो गलती हुई वह यह थी कि आरक्षण का लाभ पा चुके परिवारों को एक बार इसका लाभ देने के बाद इससे बाहर नहीं किया गया | लगभग सत्तर वर्ष बाद भी बहुत से लोग आरक्षित वर्ग में होते हुए भी आरक्षण का लाभ नहीं उठा पाए क्योंकि पहले से आरक्षण प्राप्त लोगों ने उन्हें इसका मौका उन्हें नहीं दिया | उदाहरण के लिए एक आरक्षण के बूते नौकरी प्राप्त व्यक्ति का बच्चा कोंचिग पर लाखों खर्च करके परीक्षा में बैठता है और उसका मुकाबला उस बच्चे से है जिसने सरकारी विद्यालय में शिक्षा प्राप्त की तो सफलता की ज्यादा संभावना यही है कि पहले से आरक्षण ले चुके परिवार के बच्चे को सफलता मिले, ऐसे में आरक्षण का जो उद्देश्य था, वो कहाँ पूरा हुआ ? इतना ही नहीं सामान्य वर्ग से आर्थिकता में अच्छे लोग जब आरक्षण ले रहे हैं, तो दूसरी जातियों का आरक्षण की मांग करना स्वाभाविक हो जाता है | 
क्या हल हो सकता है इस समस्या का 
आरक्षण समाप्त हो या आरक्षण का आधार आर्थिक हो, इसकी मांग उठती है, लेकिन जातिगत आरक्षण का लाभ उठा रहे लोग इसके विरोध में उतर आते हैं | आरक्षण को लेकर समाज में कटुता फ़ैल रही है | यदि जल्द ही इस समस्या का समाधान न ढूंढा गया तो यह समस्या विकराल रूप धारण कर सकती है | आरक्षण को कभी-न-कभी बंद करना ही होगा, लेकिन अभी देश ऐसी स्थिति में नहीं कि एक दम से जातिगत आरक्षण को बंद कर दिया जाए, लेकिन कुछ कदम उठाए जा सकते हैं | सबसे पहले तो यह निश्चित हो कि एक ही परिवार को बार-बार इसका लाभ न मिले | तृतीय श्रेणी कर्मचारी और अधिकारियों के बच्चों को आरक्षण का लाभ न मिले क्योंकि नौकरी में आने के बाद आर्थिक स्थिति भी सुधरती है और शिक्षा के प्रति जागरुकता भी | नौकरीपेशा लोगों के बच्चों को शिक्षा की सभी सुविधाएँ मिल सकती हैं और मिलती भी हैं, ऐसे में उन्हें आरक्षण नहीं दिया जाना चाहिए | इसका लाभ यह होगा कि धीरे-धीरे आरक्षण का लाभ हर परिवार तक पहुंचेगा और आखिर में ऐसी स्थिति आ जाएगी जब आरक्षण के लाभ की जरूरत किसी को न रहेगी | दूसरा उपाय यह है कि एक आदमी को बार-बार आरक्षण न मिले | आरक्षण से दाखिला लेकर, आरक्षण से नौकरी पाकर व्यक्ति जब आरक्षण के जरिए पदोन्नति लेता है तो विरोध होता है क्योंकि नौकरी के समय वह पिछड़ा हो सकता है, नौकरी के बाद नहीं | एक ही पद पर कार्य कर रहे दो आदमी कैसे अगड़े-पिछड़े हो सकते हैं | आरक्षण को अतीत के जातिगत विद्वेष से जोडकर नहीं देखा जाना चाहिए | आरक्षण का उद्देश्य उत्थान है और नौकरी देकर वह किया जा चुका है, इसलिए पदोन्नति में आरक्षण को बंद किया जाना चाहिए | 
इसके अतिरिक्त सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य यह है कि आरक्षित पद के लिए निर्धारित योग्य होना अति आवश्यक हो और जब तक वह पूरी न हो तब तक भर्ती न हो | आजकल बहुत से उदाहरण ऐसे आते हैं जब कोई बहुत कम अंक लेकर चुना जाता है | ऐसे मामले खूब उछाले जाते हैं | इससे एक तरफ दूसरे वर्ग विरोध करते हैं दूसरी तरफ योग्य आदमी के चयन से नुक्सान होता है | इसका उपाय यह है कि आरक्षित जातियों की शिक्षा और कोचिंग हेतु व्यवस्था हो | नौकरी भले आरक्षण से मिले लेकिन वह अयोग्य को न मिले | 
आरक्षण को लेकर भाई-चारा समाप्त हो जाते, आपसी टकराव हो इससे पहले इस विषय पर विचार करना जरूरी है | आरक्षण देने की बजाए आरक्षण को समाप्त करने की तरफ कदम बढाए जाने चाहिए क्योंकि बैसाखियों से चला तो जा सकता है, दौड़ा नहीं और जिस देश के लोग बैसाखियों से नौकरी प्राप्त करते हों, सत्ता प्राप्त करते हों वो देश दौड़ पाएगा इसमें संदेह है |
( न्यूज़बल्क पत्रिका के फरवरी-मार्च अंक में प्रकाशित )                             
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दिलबागसिंह विर्क 
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4 टिप्‍पणियां:

sunita agarwal ने कहा…

ये समस्या बिकराल रूप तो ले ही चुकी हाई .. अपने जितने संभावित समाधान सुझाए है प्रशंसनीय है पर यहाँ समस्या तो ये है की कुर्सी ये चिपके ये चूहे बिल्ली के गले में घंटी बांधना ही नही चाहते |

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

अत्यंत सारगर्भित विचारणीय लेख ...

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (01-04-2016) को "भारत माता की जय बोलो" (चर्चा अंक-2299) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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मूर्ख दिवस की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

डॉ. जेन्नी शबनम ने कहा…

आरक्षण के हर पहलू पर आपके विचार बेहद सटीक और तार्किक है. निःसंदेह आरक्षण न सिर्फ हमें बाँट रहा बल्कि नफरत की ऐसी दीवार खड़ी कर रहा जिससे देश का विनाश हो रहा है. खुद को पिछड़ा कहलाने की होड़ मची हुई है.
इस विषय पर मेरे विचार आप मेरे ब्लॉग पर पढ़ सकते हैं - http://saajha-sansaar.blogspot.in/2015/10/53.html

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